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14 June 2020

अनोखे श्लोक जिन्हें सीधा पढ़े तो रामायण और उल्टा पढ़े तो श्री कृष्ण की गाथा


क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो रामायण की कथा पढ़ी जाए और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े तो कृष्ण भागवत की कथा सुनाई दे।
जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ “राघवयादवीयम्” ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है।
इस ग्रन्थ को ‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक।
पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है 
“राघवयादवीयम।”
उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक हैः
वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥
अर्थातः 
मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं, जो जिनके ह्रदय में सीताजी रहती है तथा जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा वनवास पूरा कर अयोध्या वापिस लौटे।
विलोमम्:
सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥
अर्थातः
मैं रूक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम करता हूं, जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ विराजमान है तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरातों की शोभा हर लेती है।
राघवयादवीयम् रामस्तोत्राणि
वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥
विलोमम्:
सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥
साकेताख्या ज्यायामासीद्याविप्रादीप्तार्याधारा ।
पूराजीतादेवाद्याविश्वासाग्र्यासावाशारावा ॥ २॥
विलोमम्:
वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरापूः ।
राधार्यप्ता दीप्राविद्यासीमायाज्याख्याताकेसा ॥ २॥
कामभारस्स्थलसारश्रीसौधासौघनवापिका ।
सारसारवपीनासरागाकारसुभूरुभूः ॥ ३॥
विलोमम्:
भूरिभूसुरकागारासनापीवरसारसा ।
कापिवानघसौधासौ श्रीरसालस्थभामका ॥ ३॥
रामधामसमानेनमागोरोधनमासताम्
नामहामक्षररसं ताराभास्तु न वेद या ॥ ४॥
विलोमम्:
यादवेनस्तुभारातासंररक्षमहामनाः ।
तां समानधरोगोमाननेमासमधामराः ॥ ४॥
यन् गाधेयो योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्येसौ ।
तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमानामाश्रीहाता त्रातम् ॥ ५॥
विलोमम्:
तं त्राताहाश्रीमानामाभीतं स्फीत्तं शीतं ख्यातं ।
सौख्ये सौम्येसौ नेता वै गीरागीयो योधेगायन् ॥ ५॥
मारमं सुकुमाराभं रसाजापनृताश्रितं ।
काविरामदलापागोसमावामतरानते ॥ ६॥


विलोमम्:
तेन रातमवामास गोपालादमराविका ।
तं श्रितानृपजासारंभ रामाकुसुमं रमा ॥ ६॥

रामनामा सदा खेदभावे दया-वानतापीनतेजारिपावनते ।Y
कादिमोदासहातास्वभासारसा-मेसुगोरेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ ७॥

विलोमम्:
मेरुभूजेत्रगाकाणुरेगोसुमे-सारसा भास्वताहासदामोदिका ।
तेन वा पारिजातेन पीता नवायादवे भादखेदासमानामरा ॥ ७॥

सारसासमधाताक्षिभूम्नाधामसु सीतया ।
साध्वसाविहरेमेक्षेम्यरमासुरसारहा ॥ ८॥

विलोमम्:
हारसारसुमारम्यक्षेमेरेहविसाध्वसा ।
यातसीसुमधाम्नाभूक्षिताधामससारसा ॥ ८॥

सागसाभरतायेभमाभातामन्युमत्तया ।
सात्रमध्यमयातापेपोतायाधिगतारसा ॥ ९॥

विलोमम्:
सारतागधियातापोपेतायामध्यमत्रसा ।
यात्तमन्युमताभामा भयेतारभसागसा ॥ ९॥

तानवादपकोमाभारामेकाननदाससा ।
यालतावृद्धसेवाकाकैकेयीमहदाहह ॥ १०॥


विलोमम्
हहदाहमयीकेकैकावासेद्ध्वृतालया ।
सासदाननकामेराभामाकोपदवानता ॥ १०॥
वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरादहो ।
भास्वरस्थिरधीरोपहारोरावनगाम्यसौ ॥ ११॥

विलोमम्:
सौम्यगानवरारोहापरोधीरस्स्थिरस्वभाः ।
होदरादत्रापितह्रीसत्यासदनमारवा ॥ ११॥

यानयानघधीतादा रसायास्तनयादवे ।
सागताहिवियाताह्रीसतापानकिलोनभा ॥ १२॥

विलोमम्:
भानलोकिनपातासह्रीतायाविहितागसा ।
वेदयानस्तयासारदाताधीघनयानया ॥ १२॥

रागिराधुतिगर्वादारदाहोमहसाहह ।
यानगातभरद्वाजमायासीदमगाहिनः ॥ १३॥

विलोमम्:
नोहिगामदसीयामाजद्वारभतगानया ।
हह साहमहोदारदार्वागतिधुरागिरा ॥ १३॥

यातुराजिदभाभारं द्यां वमारुतगन्धगम् ।
सोगमारपदं यक्षतुंगाभोनघयात्रया ॥ १४॥

विलोमम्:
यात्रयाघनभोगातुं क्षयदं परमागसः ।
गन्धगंतरुमावद्यं रंभाभादजिरा तु या ॥ १४॥

दण्डकां प्रदमोराजाल्याहतामयकारिहा ।
ससमानवतानेनोभोग्याभोनतदासन ॥ १५॥

विलोमम्:
नसदातनभोग्याभो नोनेतावनमास सः ।
हारिकायमताहल्याजारामोदप्रकाण्डदम् ॥ १५॥

सोरमारदनज्ञानोवेदेराकण्ठकुंभजम् ।
तं द्रुसारपटोनागानानादोषविराधहा ॥ १६॥
विलोमम्:
हाधराविषदोनानागानाटोपरसाद्रुतम् ।
जम्भकुण्ठकरादेवेनोज्ञानदरमारसः ॥ १६॥

सागमाकरपाताहाकंकेनावनतोहिसः ।
न समानर्दमारामालंकाराजस्वसा रतम् ॥ १७॥

विलोमम्:
तं रसास्वजराकालंमारामार्दनमासन ।
सहितोनवनाकेकं हातापारकमागसा ॥ १७॥

तां स गोरमदोश्रीदो विग्रामसदरोतत ।
वैरमासपलाहारा विनासा रविवंशके ॥ १८॥

विलोमम्:
केशवं विरसानाविराहालापसमारवैः ।
ततरोदसमग्राविदोश्रीदोमरगोसताम् ॥ १८॥

गोद्युगोमस्वमायोभूदश्रीगखरसेनया ।
सहसाहवधारोविकलोराजदरातिहा ॥ १९॥

विलोमम्:
हातिरादजरालोकविरोधावहसाहस ।
यानसेरखगश्रीद भूयोमास्वमगोद्युगः ॥ १९॥

हतपापचयेहेयो लंकेशोयमसारधीः ।
राजिराविरतेरापोहाहाहंग्रहमारघः ॥ २०॥

विलोमम्:
घोरमाहग्रहंहाहापोरातेरविराजिराः ।
धीरसामयशोकेलं यो हेये च पपात ह ॥ २०॥

ताटकेयलवादेनोहारीहारिगिरासमः ।
हासहायजनासीतानाप्तेनादमनाभुवि ॥ २१॥
विलोमम्:
विभुनामदनाप्तेनातासीनाजयहासहा ।
ससरागिरिहारीहानोदेवालयकेटता ॥ २१॥

भारमाकुदशाकेनाशराधीकुहकेनहा ।
चारुधीवनपालोक्या वैदेहीमहिताहृता ॥ २२॥

विलोमम्:
ताहृताहिमहीदेव्यैक्यालोपानवधीरुचा ।
हानकेहकुधीराशानाकेशादकुमारभाः ॥ २२॥

हारितोयदभोरामावियोगेनघवायुजः ।
तंरुमामहितोपेतामोदोसारज्ञरामयः ॥ २३॥

विलोमम्:
योमराज्ञरसादोमोतापेतोहिममारुतम् ।
जोयुवाघनगेयोविमाराभोदयतोरिहा ॥ २३॥

भानुभानुतभावामासदामोदपरोहतं ।
तंहतामरसाभक्षोतिराताकृतवासविम् ॥ २४॥

विलोमम्:
विंसवातकृतारातिक्षोभासारमताहतं ।
तं हरोपदमोदासमावाभातनुभानुभाः ॥ २४॥

हंसजारुद्धबलजापरोदारसुभाजिनि ।
राजिरावणरक्षोरविघातायरमारयम् ॥ २५॥

विलोमम्:
यं रमारयताघाविरक्षोरणवराजिरा ।
निजभासुरदारोपजालबद्धरुजासहम् ॥ २५॥

सागरातिगमाभातिनाकेशोसुरमासहः ।
तंसमारुतजंगोप्ताभादासाद्यगतोगजम् ॥ २६॥

विलोमम्:
जंगतोगद्यसादाभाप्तागोजंतरुमासतं ।
हस्समारसुशोकेनातिभामागतिरागसा ॥ २६॥

वीरवानरसेनस्य त्राताभादवता हि सः ।
तोयधावरिगोयादस्ययतोनवसेतुना ॥ २७॥

विलोमम्:
नातुसेवनतोयस्यदयागोरिवधायतः ।
सहितावदभातात्रास्यनसेरनवारवी ॥ २७॥

हारिसाहसलंकेनासुभेदीमहितोहिसः ।
चारुभूतनुजोरामोरमाराधयदार्तिहा ॥ २८॥

विलोमम्
हार्तिदायधरामारमोराजोनुतभूरुचा ।
सहितोहिमदीभेसुनाकेलंसहसारिहा ॥ २८॥

नालिकेरसुभाकारागारासौसुरसापिका ।
रावणारिक्षमेरापूराभेजे हि ननामुना ॥ २९॥

विलोमम्:
नामुनानहिजेभेरापूरामेक्षरिणावरा ।
कापिसारसुसौरागाराकाभासुरकेलिना ॥ २९॥

साग्र्यतामरसागारामक्षामाघनभारगौः ॥
निजदेपरजित्यास श्रीरामे सुगराजभा ॥ ३०॥

विलोमम्:
भाजरागसुमेराश्रीसत्याजिरपदेजनि ।
गौरभानघमाक्षामरागासारमताग्र्यसा ॥ ३०॥

॥ इति श्रीवेङ्कटाध्वरि कृतं श्री ।।

24 October 2016

श्री कृष्ण भक्ति रस महिमा



कृष्ण बहिर्मुख जीव कहँ, माया करति अधीन। ताते भूल्यो आपु कहँ, बन्यो विषय-रस-मीन।। भावार्थ-- अनादिकाल से जीव अपने स्वामी से विमुख है। अतएव माया ने वश में कर लिया है। परिणामस्वरूप जीव स्वयं को देह मानने लगा एवं संसारी विषयों में आसक्त हो गया। व्याख्या- कुछ भोलेभाले ज्ञानाभिमानी माया तत्त्व को ही नहीं मानते। अतः माया तत्त्व पर गंभीर कर लीजिए। वेद कहते है - मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम। तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ।। (श्वेता. ४-१०) अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत तस्मिन्श्चान्यो मायया संनिरुद्धः (श्वेता. ४-९ ) ब्रह्मैव स्वशक्तिन् प्रकृत्यभिधेयां आश्रित्य लोकान्स्राष्टवा... और भी अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बाह्वी: प्रजा: सृजमानां सरूपा:। ( श्वेता. ४-५) क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानाविशते देव एकः । ( श्वेता. १-१०) द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविध्ये निहिते यत्र गू ढे। क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविध्ये ईशते यस्तु सोsन्य:।। ( श्वेता. ५-१)

ब्रह्मसूत्र भी-
ईक्षतेर्नाशब्दम्। ( ब्रह्मसूत्र १-१-५) रचनानुपपत्तेश्च । ( ब्रह्मसूत्र २-२-१) गीता जी भी- दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। (७-१४) मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । ( ९-१०) भूमिरापोsनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च्।। ( ७-४) अपरेयमितसत्वन्यां प्रकृतिं विद्धि में पराम् । ( ७-५ ) भागवतजी भी - एषा माया भगवतः सर्गस्थित्यंतकारिणी। ( ११-३-१६ ) माया ह्येषा भवदिया हि भूमन् । ( ४-७-३७ ) सेयं भगवतो माया यन्नयेन विरुध्यते। ( ३-७-९ ) रामायण भी - सो दासी रघुवीर की । जासु सत्यता ते जड़माया। शंकराचार्य के अनुयायी प्रख्यात अद्वैती विद्यारण्य ने कहा - "तस्मादुभयं मिलित्वैव जगत्कारणं भवति।" अर्थात् केवल ब्रह्म सृष्टि नहीं कर सकता एवं केवल जड़ माया भी सृष्टि नहीं कर सकती। अतः दोनों मान्य हैं। माया तत्त्व का भागवतजी में अद्वितीय निरूपण किया गया है। ( २-९-३३ ) ऋतेsर्थ यत्प्रतीयते न प्रतीयेत चात्मनि। तद्विद्यादात्मने मायां यथाssभासो यथा तमः।। अर्थात्- मेरे बिना ही माया की प्रतीति होती है। प्रतीति का तात्पर्य है उन्मुखता। जो जीव मेरी शरण में नहीं आये, उन्ही पर माया का अधिकार होता है। दूसरी परिभाषा यह है कि मेरे बिना जिसकी प्रतीति नहीं होती। अर्थात् मेरी प्रेरणा शक्ति के बिना जड़माया कुछ नहीं कर सकती। अब उदहारण लेते है- यथाभास:- आकाश में स्थित सूर्य का प्रतिबिंब जल आदि में पड़ता है। वह प्रतिबिंब सूर्य के बाहर ही है। और यह प्रतिबिंब भी सूर्य के आश्रय से ही प्रकट होता है। वैसे ही माया भी अपने शक्तिमान भगवान् से बाहर ही रहती है। किन्तु भगवान् की शक्ति के आश्रय से ही कार्य करती है। यथातमः - अंधकार सदा प्रकाश से दूर ही रहता है। किन्तु प्रकाश के बिना अंधकार की प्रतीति भी नहीं हो सकती। चक्षु के प्रकाश से ही तो अंधकार का निर्णय हो सकता है। इस माया शक्ति की दो (२) वृत्तियाँ होती हैं। १. जीव माया , २. गुण माया। १. जीव माया - यह जीव के स्वस्वरूप को आवृत कर देती है। जिससे जीव स्वयं को देह मान् बैठता है। पुनः संसार में रक्त हो जाता है । २. गुण माया - सत्व, रज, तम इन तीनों गुणों की साम्यावस्था प्रकृति। पुनः जीव माया की भी दो शक्तियाँ होती हैं। १. आवरणात्मिका जीव माया - इससे जीव निजस्वरूप को भूल जाता है। २. विक्षेपात्मिका जीव माया -- इससे जीव संसार में आसक्त हो जाता है। यह जीवमाया एवं गुणमाया दोनों ही सृष्टि में गौणकारण हैं अर्थात् जीवमाया, गौण निमित्तकारण एवं गुणमाया गौण उपादान कारण हैं। मुख्य निमित्तोपादान कारण तो श्रीकृष्ण ही है। तात्पर्य यह कि बहिर्मुख होने के कारण माया द्वारा स्वस्वरूप भुलाया। फिर स्वयं को देह मान कर संसार में ही आत्मा का दिव्य सुख खोजने लगा। अतः ब्रह्मलोक पर्यन्त अनंत बार विविध सुखों के भोग में ही अनवरत लगा रहा। अनंत बार स्वयं भगवान् के अवतार स्वरूप को देखा। तथा अनन्त संतों के पास भी गया किन्तु मायिक इंद्रिय मन बुद्धि होने के कारण कभी कँही शरणागत न हो सका इन सब दुखो का कारण श्री कृष्ण की विमुखता ही है

अतःइससे निर्व्रंती का उपाय भी समुखता या शरणागति ही है अतः गीता जी कहती है ----

देवी होषा गुणमयी मम्ममाया दुरत्यया |
मामे ये प्रपधन्ते यामामेता तरन्ति ते || ( ७-१४ )

-- आनन्द चतुर्वेदी ( नन्दा )

15 August 2016

श्री कृष्ण राधा भक्ति रस


जोई राधा सोइ क्रष्ण हैं, इनमेँ भेद न मान। इक हैँ ह्लादिनी शक्ति अरु, शक्तिमान इक जान।। भावार्थ- श्री राधा ही का अपर अभिन्न स्वरूप श्री क्रष्ण हैं। एवं श्री क्रष्ण का ही अपर स्वरूप श्री राधा हैं। क्योकि राधा शक्ति हैं, एवं श्री क्रष्ण शक्तिमान् हैं। व्याख्या-- अथर्ववेदीय राधाकातापनियोपनिषद् में वेद की ऋचाओं ने ब्रह्मज्ञानियों से कहा है। यथा- ये यं राधायश्च कृष्णो रसाब्धिर्देहश्चैक क्रीडनार्थं द्विधाsभूत् । अर्थात् श्री राधाकृष्ण के दो होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, उनके दो देह भी नहीं है। एक ही सत्ता एवं वही सत्तास्वरूप ही एक ही देह भी है। किंतु लीला के हेतु दो स्वरूप धारण किये रहते हैं। इसी प्रकार ऋग्वेदीय राधाकोपनिषत् में भी इसी आशय से कहा है। यथा- ये यं राधायश्च कृष्णो रसाब्धिर्देहेनायकः क्रीडनार्थं द्विधाsभूत् । सनत्कुमार संहिता में भी कहा गया है। यथा- राधिका कृष्ण रूपं च, कृष्णो राधा स्वरूपक:। ब्रह्मवैवर्तपुराण में इस पर विस्तृत विवेचन है। यथा - यथा क्षीरे च धावल्यं, दाहकता च हुताशने, भूमौ गन्धो जले शैत्य तथा त्वयि ममस्थिति:। अर्थात् एक बार श्री राधाजी ने लीला में श्री कृष्ण से पूछा कि मैं तुम्हारे वियोग में कैसे जीवित रह सकूँगी। तब श्रीकृष्ण ने उपर्युक्त उदहारण देकर कहा था कि वियोग तो दो तत्वों में हुआ करता है। मुझ से वियुक्त तो प्राकृत जगत् भी नहीं हो सकता। फिर हमारा तुम्हारा सम्बन्ध तौ एसो है जैसे दूध में श्वेतिमा । भला दूध की सफेदी कभी दूध से प्रथक हो सकती है? पुनः कहा कि जैसे आग में दाहकता। अर्थात् आग से कभी दाहकता पृथक नहीं हो सकती। इसी प्रकार पृथिवी से गंध, जल से शीतलता कभी वियुक्त हो सकती है ? ठीक उसी प्रकार हम दोनों एक थे। एक हैं। एक रहेंगे। यदि कोई शंका करे दूध से श्वेतिमा पृथक् नहीं होती किंतु राधा कृष्ण तो पृथक् होते रहते हैं। इसका विज्ञानं यह है कि दूध या आग या पृथिवी या जल जड़ तत्त्व हैं। अतः पृथक् नहीं होते। जीवगण भी अणुचित् हैं किंतु राधा कृष्ण तो विभुचित् हैं। उनके पास अघटित घटना पटियसि योगमाया की शक्ति है। वह शक्ति चैतन्य है। एवं कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ है। अतः जब जैसी इच्छा करें, वैसी ही क्रिया होने लगती है। पुनः वेद का ही घोष है । यथा - स इममेवात्मानं द्वेधापातयत्ततः पतिश्च पत्नी चाभवताम् ।। ( ब्रह्दारण्य. १-४-३ ) तंत्रों में भी वेदों का ही समर्थन किया है । यथा - एकं ज्योतिरभूद्द्वैधा राधा माधव रूपकम्। ( सम्मोहन तंत्र ) पुनः शक्तिस्वरूपा राधा जी हैं। एवं शक्तिमान् श्रीकृष्ण हैं। वेद कहते है -- तस्य शक्तयस्त्वनेकधा।
ह्लादिनी-संधिनी ज्ञानेच्छा क्रियाद्या: बहुविद्या: शक्तय:।
तास्वाह्लादिनी वरीयसी परमान्तरङ्गभूता राधा कृष्णेन आराध्यते इति राधा कृष्णं समाराधयति सदा। ( ऋग्वेदीय राधकोपनिषद् ) विष्णु पुराण में भी (६-७-६१) , यथा- विष्णुशक्ति: परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथाsपरा। अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ।। अर्थात् परात्पर श्रीक्रष्ण की अनन्त शक्तियॉं हैं। उनमें सर्वाधिक अन्तरंग शक्ति का नाम ह्लादिनी शक्ति है। वही श्रीराधा हैं। कोई भी शक्ति अपने शक्तिमान् से पृथक् नहीं हो सकती। वस्तुतः शक्ति एवं शक्तिमान् दो तत्त्व ही नहीं होते। चैतन्यदेव ने सनातन को विस्तार से समझाया है। यथा-- चिच्छक्ति स्वरूपशक्ति अन्तरंगा नाम। ताहार वैभवानन्त वैकुण्ठादि धाम।। अर्थात् माया शक्ति की परिणिति अनन्त-कोटि ब्रह्माण्ड हैं।जीव-शक्ति की परिणिति अनन्त जीव विशेष हैं। एवं चित् शक्ति जिसे स्वरूप शक्ति भी कहते है, उसकी परिणिति दिव्य चिन्मय अनन्त बैकुण्ठादि धाम हैं। यह चित् शक्ति चेतन है। माया-शक्ति के समान जड़ नहीं है। इस चित् या स्वरूप शक्ति या योगमाया की शक्ति में सब कुछ न करने एवं उलटा करने की भी शक्ति है। इस चित् शक्ति के ३ भेद हैं। तथा -- सत् चित् आनन्द कृष्णेर स्वरूप, अतएव स्वरूप शक्ति हय तिनरूप। अर्थात् यह स्वरूप शक्ति( चित्) सत्स्वरूप, चित्स्वरूप एवं आनन्द स्वरूप हो जाती है। पुनः चैतन्यदेव आगे कहते है। यथा - आनन्दांशे ह्लादिनी सदंशे संधिनी चिदंशे संवित् जारे ज्ञान करि मानी। अर्थात् सा सदंश की अधिष्ठात्री शक्ति को संधिनी शक्ति एवं चिदंश की अधिष्ठात्री शक्ति को संवित् शक्ति तथा आनन्द शक्ति की अधिष्ठात्री शक्ति को ह्लादिनी शक्ति कहते हैं। इनमें सत् शक्ति द्वारा ( संधिनी द्वारा ) श्रीक्रष्ण अपनी सत्ता की रक्षा करते है। तथा संवित् शक्ति के द्वारा सदा सर्वज्ञ बने रहते हैं। एवं ह्लादिनी शक्ति के द्वारा सदा आनन्दमय रहते हैं। इतना ही नहीं वरन् इन शक

13 August 2016

श्री कृष्ण कैसे मिल सकते हैं ?




॥श्रीहरिः॥

श्री राधा जी सप्त सखियों के साथ ध्यान माधुर्य रूप रस में निमग्न थी ।
ललिता सखी कहने लगी .....
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कामवन काहु दिन , काहु दिन बरसाने
नंदगांम काहु दिन , नंद घर धावैगे ।।
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 छिद्र वन काहु दिन , भद्रवन काहु दिन ।
काऊ दिन मधुवन वृंदावन आवैंगे ।।
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प्रेमी कहे काहु , दिन दाऊजी दरस करें
काहू दिन गोकुल में यमुना नहावैंगे ।।
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गोवर्धन राधा कुंड जतीपुरा गिरिराज
काहू दिन या चक्कर में श्रीकृष्ण मिल जावैंगे⁠⁠⁠⁠

- Upendra Chaturvedi