07 February 2022
05 February 2022
अयोध्या में एक उच्च कोटि के संत | अनोखी कथा
अयोध्या में एक उच्च कोटि के संत | अनोखी कथा
श्री अयोध्या जी में एक उच्च कोटि के संत रहते थे ,इन्हें रामायण का श्रवण करने का व्यसन था । जहां भी कथा चलती वहाँ बड़े प्रेम से कथा सुनते , कभी किसी प्रेमी अथवा संत से कथा कहने की विनती करते । एक दिन राम कथा सुनाने वाला कोई मिला नहीं । वही पास से एक पंडित जी रामायण की पोथी लेकर जा रहे थे ।
पंडित जी ने संत को प्रणाम् किया और पूछा कि महाराज ! क्या सेवा करे ?
संत ने कहा – पंडित जी , रामायण की कथा सुना दो परंतु हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रुपया नहीं है ,हम तो फक्कड़ साधु है । माला ,लंगोटी और कमंडल के अलावा कुछ है नहीं और कथा भी एकांत में सुनने का मन है हमारा ।
पंडित जी ने कहा – ठीक है महाराज। संत और कथा सुनाने वाले पंडित जी दोनों सरयू जी के किनारे कुंजो में जा बैठे ।
पंडित जी और संत रोज सही समय पर आकर वहाँ विराजते और कथा चलती रहती । संत बड़े प्रेम से कथा श्रवण करते थे और भाव विभोर होकर कभी नृत्य करने लगते तो कभी रोने लगते।
जब कथा समाप्त हुई तब संत ने पंडित जी से कहा – पंडित जी ,आपने बहुत अच्छी कथा सुनायी । हम बहुत प्रसन्न है ,हमारे पास दक्षिणा देने के लिए रूपया तो नहीं है परंतु आज आपको जो चाहिए वह आप मांगो ।
संत सिद्ध कोटि के प्रेमी थे , श्री सीताराम जी उनसे संवाद भी किया करते थे । पंडित जी बोले – महाराज हम बहुत गरीब है ,हमें बहुत सारा धन मिल जाये ।
संत ने प्रार्थना की कि प्रभु इसे कृपा कर के धन दे दीजिये । भगवान् ने मुस्कुरा दिया , संत बोले – तथास्तु ।
फिर संत ने पूछा – मांगो और क्या चाहते हो ?
पंडित जी बोले – हमारे घर पुत्र का जन्म हो जाए ।
संत ने पुनः प्रार्थना की और श्रीराम जी मुस्कुरा दिए । संत बोले – तथास्तु ,तुम्हे बहुत अच्छा ज्ञानी पुत्र होगा ।
फिर संत बोले और कुछ माँगना है तो मांग लो ।
पंडित जी बोले – श्री सीताराम जी की अखंड भक्ति ,प्रेम हमें प्राप्त हो ।
संत बोले – नहीं ! यह नहीं मिलेगा ।
पंडित जी आश्चर्य में पड़ गए कि महात्मा क्या बोल गए । पंडित जी ने पूछा – संत भगवान् ! यह बात समझ नहीं आयी ।
संत बोले – तुम्हारे मन में प्रथम प्राथमिकता धन ,सम्मान ,घर की है । दूसरी प्राथमिकता पुत्र की है और अंतिम प्राथमिकता भगवान् की भक्ति की है । जब तक हम संसार को , परिवार ,धन ,पुत्र आदि को प्राथमिकता देते है तब तक भक्ति नहीं मिलती ।
भगवान् ने जब केवट से पूछा कि तुम्हे क्या चाहिए ? केवट ने कुछ नहीं माँगा । प्रभु ने पूछा – तुम्हे बहुत सा धन देते है , केवट बोला नहीं । प्रभु ने कहा – ध्रुव पद ले लो ,केवट बोला – नहीं । इंद्र पद, पृथ्वी का राजा और मोक्ष तक देने की बात की परंतु केवट ने कुछ नहीं लिया तब जाकर प्रभु ने उसे भक्ति प्रदान की ।
हनुमान जी को जानकी माता ने अनेको वरदान दिए – बल, बुद्धि ,सिद्धि ,अमरत्व आदि परंतु उन्हे प्रसन्नता नहीं हुई । अंत में जानकी जी ने श्री राम जी का प्रेम, अखंड भक्ति का वर दिया । प्रह्लाद जी ने भी कहा कि हमारे मन में मांगने की कभी कोई इच्छा ही न उत्पन्न हो तब भगवान् ने अखंड भक्ति प्रदान की ।
31 January 2022
एक और झूठा | अनोखी कथा
अनोखी कथा
एकऔर झूठा
अम्मा!.आपके बेटे ने मनीआर्डर भेजा है।
डाकिया बाबू ने अम्मा को देखते अपनी साईकिल रोक दी। अपने आंखों पर चढ़े चश्मे को उतार आंचल से साफ कर वापस पहनती अम्मा की बूढ़ी आंखों में अचानक एक चमक सी आ गई..
बेटा!.पहले जरा बात करवा दो।
अम्मा ने उम्मीद भरी निगाहों से उसकी ओर देखा लेकिन उसने अम्मा को टालना चाहा..
अम्मा!. इतना टाइम नहीं रहता है मेरे पास कि,. हर बार आपके बेटे से आपकी बात करवा सकूं।
डाकिए ने अम्मा को अपनी जल्दबाजी बताना चाहा लेकिन अम्मा उससे चिरौरी करने लगी..
बेटा!.बस थोड़ी देर की ही तो बात है।
अम्मा आप मुझसे हर बार बात करवाने की जिद ना किया करो!
यह कहते हुए वह डाकिया रुपए अम्मा के हाथ में रखने से पहले अपने मोबाइल पर कोई नंबर डायल करने लगा..
लो अम्मा!.बात कर लो लेकिन ज्यादा बात मत करना,.पैसे कटते हैं।
उसने अपना मोबाइल अम्मा के हाथ में थमा दिया उसके हाथ से मोबाइल ले फोन पर बेटे से हाल-चाल लेती अम्मा मिनट भर बात कर ही संतुष्ट हो गई। उनके झुर्रीदार चेहरे पर मुस्कान छा गई।
पूरे हजार रुपए हैं अम्मा!
यह कहते हुए उस डाकिया ने सौ-सौ के दस नोट अम्मा की ओर बढ़ा दिए।
रुपए हाथ में ले गिनती करती अम्मा ने उसे ठहरने का इशारा किया..
अब क्या हुआ अम्मा?
यह सौ रुपए रख लो बेटा!
क्यों अम्मा? उसे आश्चर्य हुआ।
हर महीने रुपए पहुंचाने के साथ-साथ तुम मेरे बेटे से मेरी बात भी करवा देते हो,.कुछ तो खर्चा होता होगा ना!
अरे नहीं अम्मा!.रहने दीजिए।
वह लाख मना करता रहा लेकिन अम्मा ने जबरदस्ती उसकी मुट्ठी में सौ रुपए थमा दिए और वह वहां से वापस जाने को मुड़ गया।
अपने घर में अकेली रहने वाली अम्मा भी उसे ढेरों आशीर्वाद देती अपनी देहरी के भीतर चली गई।
वह डाकिया अभी कुछ कदम ही वहां से आगे बढ़ा था कि किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा..
उसने पीछे मुड़कर देखा तो उस कस्बे में उसके जान पहचान का एक चेहरा सामने खड़ा था।
मोबाइल फोन की दुकान चलाने वाले रामप्रवेश को सामने पाकर वह हैरान हुआ..
भाई साहब आप यहां कैसे?. आप तो अभी अपनी दुकान पर होते हैं ना?
मैं यहां किसी से मिलने आया था!.लेकिन मुझे आपसे कुछ पूछना है।
रामप्रवेश की निगाहें उस डाकिए के चेहरे पर टिक गई..
जी पूछिए भाई साहब!
भाई!.आप हर महीने ऐसा क्यों करते हैं?
मैंने क्या किया है भाई साहब?
रामप्रवेश के सवालिया निगाहों का सामना करता वह डाकिया तनिक घबरा गया।
हर महीने आप इस अम्मा को भी अपनी जेब से रुपए भी देते हैं और मुझे फोन पर इनसे इनका बेटा बन कर बात करने के लिए भी रुपए देते हैं!.ऐसा क्यों?
रामप्रवेश का सवाल सुनकर डाकिया थोड़ी देर के लिए सकपका गया!.
मानो अचानक उसका कोई बहुत बड़ा झूठ पकड़ा गया हो लेकिन अगले ही पल उसने सफाई दी..
मैं रुपए इन्हें नहीं!.अपनी अम्मा को देता हूंँ।
मैं समझा नहीं?
उस डाकिया की बात सुनकर रामप्रवेश हैरान हुआ लेकिन डाकिया आगे बताने लगा...
इनका बेटा कहीं बाहर कमाने गया था और हर महीने अपनी अम्मा के लिए हजार रुपए का मनी ऑर्डर भेजता था लेकिन एक दिन मनी ऑर्डर की जगह इनके बेटे के एक दोस्त की चिट्ठी अम्मा के नाम आई थी।
उस डाकिए की बात सुनते रामप्रवेश को जिज्ञासा हुई..
कैसे चिट्ठी?.क्या लिखा था उस चिट्ठी में?
संक्रमण की वजह से उनके बेटे की जान चली गई!. अब वह नहीं रहा।
फिर क्या हुआ भाई?
रामप्रवेश की जिज्ञासा दुगनी हो गई लेकिन डाकिए ने अपनी बात पूरी की..
हर महीने चंद रुपयों का इंतजार और बेटे की कुशलता की उम्मीद करने वाली इस अम्मा को यह बताने की मेरी हिम्मत नहीं हुई!.मैं हर महीने अपनी तरफ से इनका मनीआर्डर ले आता हूंँ।
लेकिन यह तो आपकी अम्मा नहीं है ना?
मैं भी हर महीने हजार रुपए भेजता था अपनी अम्मा को!. लेकिन अब मेरी अम्मा भी कहां रही। यह कहते हुए उस डाकिया की आंखें भर आई।
हर महीने उससे रुपए ले अम्मा से उनका बेटा बनकर बात करने वाला रामप्रवेश उस डाकिया का एक अजनबी अम्मा के प्रति आत्मिक स्नेह देख नि:शब्द रह गया।






