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10 August 2016

हनुमान अष्टक का भावार्थ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित


 में महाबली हनुमान जी की शौर्य, अतुलित शक्ति, साहस, पराक्रम, आत्मविश्वास और राम भक्ति की प्रशंसा में आठ छन्द है। प्रतिदिन हनुमान चालीसा एवं हनुमानाष्टक पाठ करने से व्यक्ति की हर प्रकार के बाधा, संकट, कष्ट, एवं परेशानी दूर हो जाती है तथा हनुमान जी की असीम कृपा प्राप्त होती है।


बाल समय रबि लियो तब तीनहुँ लोक भयो अँधियारो।
ताहि सों त्रास भयो जग को यह संकट काहु सों जात न टारो॥
देवन आनि करी बिनती तब छाँडि दियो रबि कष्ट निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥1॥
अर्थ: हे परमवीर हनुमानजी! आपने बाल्यकाल में सूर्य को खा लिया था और तीनों लोक में अँधेरा हो गया था । पुरे जग में विपदा का समय था जिसे कोई टाल नहीं पा रहा था । सभी देवताओं ने आपसे प्रार्थना कि सूर्य को छोड़ दे और हम सभी के कष्टों को दूर करें। कौन नहीं जानता ऐसे कपि को जिनका नाम हीं संकट मोचन अर्थात संकट को हरने वाला है। आपने देवताओं के बड़े और कठिन कार्यों को पूरा किया है, फिर मुझ दीन-हीन का ऐसा कौन-सा संकट हो सकता है, जिसे आप दूर नहीं कर सकते।

बालि की त्रास कपीस बसे गिरि जात महाप्रभु पंथ निहारो।
चौंकि महा मुनि साप दियो तब चाहिय कौन बिचार बिचारो॥
कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु सो तुम दास के सोक निवारो॥2॥ को नहिं.....
अर्थ: बाली से डरकर सुग्रीव और उसकी सेना पर्वत पर आकार रहने लगती हैं तब इन्होने ने भगवान राम को इस तरफ बुलाया और स्वयं ब्राह्मण का वेश रख भगवान की भक्ति की इस प्रकार ये भक्तों के संकट दूर करते हैं ।

अंगद के सँग लेन गये सिय खोज कपीस यह बैन उचारो।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो॥
हरि थके तट सिंधु सबै तब लाय सिया-सुधि प्रान उबारो॥3॥ को नहिं.....
अर्थ: अंगद के साथ जाकर आपने माता सीता का पता किया और उन्हें खोजा एवम इस मुश्किल का हल किया । उनसे कहा गया था – अगर आप बिना सीता माता की खबर लिए समुद्र तट पर आओगे तो कोई नहीं बचेगा । उसी तट पर सब थके हारे बैठे थे जब आप सीता माता की खबर लाये तब सबकी जान में जान आई।

रावन त्रास दई सिय को सब राक्षसि सों कहि सोक निवारो।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु जाय महा रजनीचर मारो॥
चाहत सीय असोक सों आगि सु दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो॥4॥ को नहिं.....
अर्थ: रावण ने सीता माता को बहुत डराया और अपने दुखो को ख़त्म करने के लिए राक्षसों की शरण में आने कहा । तब मध्य रात्री समय हनुमान जी वहाँ पहुँचे और उन्होंने सभी राक्षसों को मार कर अशोक वाटिका में माता सीता को खोज निकाला और उन्हें भगवान् राम की अंगूठी देकर माता सीता के कष्टों का निवारण किया।

बान लग्यो उर लछिमन के तब प्रान तजे सुत रावन मारो।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो॥
आनि सजीवन हाथ दई तब लछिमन के तुम प्रान उबारो॥5॥ को नहिं.....
अर्थ: रावण के पुत्र इन्द्रजीत के शक्ति के प्रहार से लक्षमण मूर्छित हो जाते हैं उनके प्राणों की रक्षा के लिए हनुमान जी वैद्य सुषेन को उनके घर के साथ उठ लाते हैं । और उनके कहे अनुसार बूटियों के पहाड़ को उठाकर ले आते हैं और लक्षमण को संजीवनी देकर उनके प्राणों की रक्षा करते हैं।

रावन जुद्ध अजान कियो तब नाग की फाँस सबे सिर डारो।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल मोह भयो यह संकट भारो॥
आनि खगेस तबै हनुमान जु बंधन काटि सुत्रास निवारो॥6॥ को नहिं.....
अर्थ: रावण ने जब राम एवम लक्षमण पर नाग पाश चलाया तब दोनों ही मूर्छित हो जाते हैं और सभी पर संकट छा जाता हैं । नाग पाश के बंधन से केवल गरुड़ राज ही मुक्त करवा सकते थे । तब हनुमान उन्हें लाते हैं और सभी के कष्टों का निवारण करते हैं।

बंधु समेत जबै अहिरावन लै रघुनाथ पताल सिधारो।
देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो॥
जाय सहाय भयो तब ही अहिरावन सैन्य समेत सँहारो॥7॥ को नहिं.....
अर्थ: एक समय जब अहिरावण एवम मही रावण दोनों भाई भगवान राम को लेकर पाताल चले जाते हैं तब हनुमान अपने मंत्र और साहस से पाताल जाकर अहिरावन और उसकी सेना का वध कर भगवान् राम को वापस लाते हैं।

काज किये बड देवन के तुम बीर महाप्रभु देखि बिचारो।
कौन सो संकट मोर ग़रीब को जो तुमसों नहिं जात है टारो॥
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कछु संकट होय हमारो॥8॥ को नहिं.....
अर्थ: भगवान् के सभी कार्य किये तुमने और संकट का निवारण किया मुझ गरीब के संकट का भी नाश करो प्रभु । तुम्हे सब पता हैं और तुम्ही इनका निवारण कर सकते हो । मेरे जो भी संकट हैं प्रभु उनका निवारण करों।

दोहा:
लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लँगूर।
बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥
अर्थ: लाल रंग का सिंदूर लगाते हैं ,देह जिनकी लाल हैं और लंबी सी पूंछ हैं वज्र के समान बलवान शरीर हैं जो राक्षसों का संहार करते हैं ऐसे श्री कपि को बार बार प्रणाम।

महिलाओं को हनुमान जी की साधना करने मे ध्यान रखने वाली बातें




 कलयुग में हनुमान जी की पूजा से भक्तों के सभी मनोरथ सिद्द हो जाते है। हनुमान जी की आराधना से सभी प्रकार के संकट शीघ्र ही दूर हो
जाते है, उनके भक्त निर्भय हो जाते है उन्हें किसी भी विषय का भय नहीं रहता है ।

      हनुमान जी अखण्ड ब्रह्मचारी व महायोगी भी हैं इसलिए सबसे जरूरी है कि उनकी किसी भी तरह की उपासना में ब्रह्मचर्य व इंद्रिय संयम को अपनाएं। वैसे तो किसी भी देवी देवता की पूजा का अधिकार महिलाओं और पुरूषों सभी को एक समान होता है लेकिन हनुमान जी की पूजा का अधिकार महिलाओं और पुरूषों को एक समान नहीं है। हनुमान की पूजा आमतौर पर पुरुष करते हैं और महिलाओं के लिए कई नियम है क्योंकि हनुमान जी ब्रह्मचारी थे ।

           हनुमान जी सभी महिलाओं को माता के समान मानते थे। उन्हें किसी भी स्त्री का अपने आगे झुकना नहीं भाता है क्योंकि वह स्वयं स्त्री जाती को नमन करते हैं। इसलिए उनकी पूजा में कई ऐसे कार्य है जिन्हे महिलाओं को नहीं करना चाहिए ।

महिलाएं हनुमान जी की पूजा में यह कार्य कर सकती हैं :-

* महिलाएं दीप अर्पित कर सकती हैं।

* महिलाएं गूगुल की धूनी रमा सकती हैं।

* महिलाएं हनुमान चालीसा, संकट मोचन, हनुमानाष्टक, सुंदरकांड आदि का पाठ कर सकती हैं।

* महिलाएं हनुमान जी का भोग प्रसाद अपने हाथों से बनाकर अथवा बाजार से लाकर अर्पित कर सकती हैं।

महिलाएं हनुमान जी की पूजा में यह कार्य नहीं कर सकती :-

* महिलाएं लंबे अनुष्ठान नहीं कर सकती। इसके पीछे उनका राजस्वला होना और घरेलू उत्तरदाय़ित्व निभाना मुख्य कारण है।

* महिलाएं रजस्वला होने पर हनुमान जी से संबंधित कोई भी कार्य न करें।

* महिलाएं हनुमान जी को सिंदूर अर्पित नहीं कर सकती है ।

* महिलाओं को हनुमान जी को चोला भी नहीं चढ़ाना चाहिए ।

* महिलाओं को बजरंग बाण का पाठ नहीं करना चाहिए।

* महिलाओं को हनुमान जी को आसान नहीं देना चाहिए।

* महिलाओं को पाद्यं अर्थात चरणपादुकाएं अर्पित नहीं करनी चाहिए।

* महिलाएं हनुमान जी को पंचामृत स्नान नहीं करा सकती।

* महिलाएं वस्त्र युग्म अर्थात कपड़ों का जोड़ा समर्पित नहीं कर सकती।

* महिलाएं यज्ञोपवीतं अर्थात जनेऊ अर्पित नहीं कर सकते।
आनन्द ही आनन्द