"उठो भाइयो बुला रहा ये धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र सभी को "
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम !
योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने ये उपदेश देते हुए कहा था,कि हे पार्थ तेरा धर्म सिर्फ आजकी परिस्थिति में इतना भर है,कि तू गांडीव उठा और ये जो विपक्षी दल -सैना खड़ी है जिसकी मति और धर्म उन्हें पहले ही म्रत जानकर उनका साथ छोड़ चुके हैं उन्ह मरे जैसों को मारकर अपना धर्म निभा!
अर्जुन उवाच
कैर्लिग्डैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो।
किमाचारःकथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते।
अर्जुन बोले--इन तीनों गुणोंसे अतीत पुरुष किन-किन लक्षणोंसे युक्त होता है और किस प्रकारके आचरणोंवाला होता है;तथा हे प्रभो!मनुष्य किस उपायसे इन तीनों गुणों से अतीत होता है? ।।21।।अध्याय 14
साथिओ ये आगामी विधानसभा चुनाव ठीक उस धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र की तरह आपके सामने खड़ा है,
एक ओर वो कुरीत-अनीत-और दुराचरणी प्रवृत्ति को व धर्म विरुद्ध आचरण करने वालों की विशाल सैना है,जिसका नेतृत्व आजके वो दुर्योधन-दुशासन- कर्ण-विकर्ण आदि महावली कर रहे हैं और दूसरी ओर "धर्म"का पालन व रक्षार्थ खड़ी ये युधिष्ठिर-भीम और तू खड़ा है!
सोहे आजके तमाम मतदाताओ यानी अर्जुनों उठो और अपनीगांडीव उठाओ और संसार की सर्वश्रेष्ठ सनातन संस्कृति और हिंदुत्व की रक्षार्थ अपने मत का सदुपयोग करते हुए उस केशरिया ध्वजवाहक के पक्ष में खड़े होकर मेरा अनुसरण कर।आगे पुःन भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं।
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काड्क्षति।।
श्रीभगवान् बोले--हे अर्जुन!जो पुरुष सत्त्वगुणके कार्यरूप प्रकाश को *और रजोगुणके कार्यरुप प्रवृत्तिको तथा तमोगुणके कार्यरूप मोहको भी न तो प्रवृत्त होनेपर उनसे द्वेष करता है और न निवृत्त होनेपर उनकी आकांक्षा करता है।। 22।। अध्याय 14
सो हे आजके तमाम मनुष्य रुपी अर्जुनों उठो और अपने धर्म और सनातन संस्कृति की रक्षार्थ अपने धर्म यानी "बोट रुपी "मत यानी गांडीव को उपयोगी बनायें!
साथिओ इतिहास अपने को पुनः दोहरा रहा है,एकबार फिर वो दुराचरणी सोच के पोषक जो न राम को मानते हैं,और नाही योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण को!तभी तो कल उन्होंने भगवान राम के अस्तित्व को ही नकार दिया था और वही सोच आज कह रही है
कि इस "जन्मभूमि "यानी भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि के स्वरुप मंदिर को मथुरा से कहीं और लेजाओ?क्या आप उस दुराचरणी सोच को जीतते देखना चाहेंगे?जिससे फिर किसी द्रुपद सुता "द्रौपदी "का चीरहरण भरी सभा में वो दुर्योधन-दुशासन करने का दुस्साहस करें?
सत्त्वानुरुपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोSयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।
हे भारत!सभी मनुष्योंकी श्रद्धा उनके अन्तःकरणके अनुरुप होती है।यह पुरुष श्रद्धामय है,इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है,वह स्वयं भी वही है ।।3।। अध्याय 17.
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः।।
सात्त्विक पुरुष देवोंको पूजते हैं,
राजस पुरुष यक्ष और राक्षसोंको तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं,वे प्रेत और भूतगणोंको पूजते हैं।।4।।अध्याय 17
सो हे आजके तमाम मतदाताओं आप स्वयं भी अपने अपने मार्ग का वरण करते हुए अपना पक्ष देखें?कि किसका पक्षधर बनकर कौंन से मार्ग पर जाना चाहते हैं?
भाइयो ये आगामी विधानसभा चुनाव ठीक हमारे सामने इसी मुकाम पर आखड़ा है! कि हम कल अपनी आने वाली पीढ़ियों को क्या देखना चाहते हैं?






